विचार मंथन

Share your thought with all to make change in the World

18 Posts

99 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 17555 postid : 1140830

साँझ की शिकायत

Posted On: 20 Feb, 2016 कविता में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

शिकायत साँझ ने कुछ ऐसे की
जैसा कोई रूठा दोस्त शिकायत कर रहा हो
कहा की मुझे भूल गया तू
सुबह से रात तक जगता
खून पसीना बहा
कागज़ जोड़ रहा

आज हाथ थाम
उसने लिया बैठा
उस गाँव मे जिसे
बहुत पहले अकेला छोड़ आया था मैं तनहा,
शाम ने धुंध को लपेटे हुए पूछा
उस शहर में ऐसा क्या पाया
तूने जो अपनी मिट्टी को
पीछे छोड़ दिया
गाँव की पगडण्डी को मोड़
शाम से नाता तोड़ दिया
रात से दिन तक यंत्रमानव
बना हुआ
रुक कभी मेरे साथ यहाँ
दिन की धुप और रात के अँधेरे के
बीच में है यही शाम
जो तुझे थामे हुए है
मेरे साथ कभी बैठ जरा..
Rinki

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

11 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Bhola nath Pal के द्वारा
February 21, 2016

“ दिन की धुप और रात के अँधेरे के बीच में है यही शाम जो तुझे थामे हुए है मेरे साथ कभी बैठ जरा.” विश्राम को अच्छे से परिभाषित किया है आपने………..

Rinki Raut के द्वारा
February 21, 2016

बहुत धन्यवाद कविता पढ़ने के लिए, भोला नाथ जी

Rinki Raut के द्वारा
February 21, 2016

गाँव की शाम जैसा कुछ नहीं

Jain के द्वारा
February 21, 2016

इस कविता ने मुझे अपने गाँव की याद दिला दी है, अच्छी कविता है. रिंकी

जेपी हंस के द्वारा
February 23, 2016

शानदार, जबरदस्त, जिन्दाबाद….बहुत उम्दा कविता…

harirawat के द्वारा
March 1, 2016

अति सुन्दर कविता रिंकी जी, कुदरत के फैले हाथ, धरती का आखरी छोर, दिनकर हुआ थककर चूर, करने चला विश्राम, अपनी आखरी लालिमा फैला कर, समुद्र की गहराई में ! अच्छी कविता के लिए बधाई के शब्द भी शायद कम पड़ें ! हरेन्द्र जागते रहो

Idalee के द्वारा
October 17, 2016

You are so awesome for helping me solve this myeyrst.


topic of the week



latest from jagran