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ब्लॉगर और अपरिचित लेखको के रचना को “कचरा साहित्य” के नाम से पहचाना जाता है

Posted On 16 Jan, 2018 Junction Forum में

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साहित्य बहुत व्यापक और विस्तृत शब्द है, एक विशाल समुंदर के समान जिसकी गेहराई और छोर नापना कठिन हैI वो हर इन्सान जो लिखने में रूचि या कहे लिखने की हिम्मत रखता है,वो हिंदी साहित्य मे अपना छोटा सा योगदान देना चाहता है या हिस्सा बनना चाहता हैI कुछ दिनों पहले साहित्य की गरिमा को धूमिल करने वाला एक नया शब्द से मेरा परिचय हुआ “ कचरा साहित्य “ ये वो शब्द है जिसे शब्दकोश में ढूँढना बेवकूफी होगी इस शब्द का मतलब जानने के लिए गूगल बाबा के शरण में जाना होगा I तब भी शायद ही कचरा साहित्य का ठीक मतलब मिल पाए I
इसे ऐसे समझा जा सकता है, वो तमाम शौकिया या कहे मजबूर लेखक बिलकुल मेरे और आपके तरह जिनके पास ऐसा कोई प्लेटफार्म/स्थान उपलब्ध नहीं है, जहाँ वो अपनी लिखी हुई रचना कविता,कहानी,लेख और विचार को समाज से साझा कर सके, क्यूंकि हम जैसे लोग भारत के गली-कुचो में रहते हैI हम जैसे लोग ऐसे परिवार से आते है जिनका साहित्क पृष्ठभूमि नहीं होता हैI हम जैसे लोगो को उत्कृष्ट साहित्यकार हेय की दृष्टी से देखते है और हमारे द्वारा लिखे जाए काम को “कचरा साहित्य” के नाम से पुकारते हैI

जब पहली बार इस शब्द को सुना तो मन अन्दर से विचलित हो गया ये सोचकर की कैसे कोई किसी के लेखन को कचरे जैसा रद्दी समझ सकता है, पर बात इतनी छोटी नहीं है देश के हिंदी के महान लेखक जिनकी पहुँच अख़बार,प्रकाशन और सीमांत वर्ग के साथ है उनके लिए सफल लेखक बनना आसान होता है, बनस्पत हम जैसे ब्लॉगर,सोशल मीडिया के दुसरे मंच पर लिखने वाले लोगो के मुकाबले I
आपने भाई-भतीजाबाद के बारे में सुना होगा इस विषय पर फिल्म इंडस्ट्री में जोर-शोर से चर्चा होती रही है, भाई-भतीजाबाद सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री मे ही नही राजनीती, छोटे बड़े ऑफिस,इंडस्ट्री आदि जहाँ भी ये चल जाए देखने को मिल जाता हैI कभी-कभी लेखक वर्ग में भी भाई-भतीजाबाद पाया जाता है, हर उस लेखक को सहराना और प्रोत्साहन मिल जाता हैI
जो किसी नमी व्यक्ति या परिवार से तालुक रखते हैI हम जैसे लोग ब्लॉग,अखबार,पत्रिका और प्रकाशन ऑफिस के चक्की में अपना सर घुसाए परेशान होते रहते हैI
मैं इन महान साहित्कारो से बस इतनी गुज़ारिश करना चाहती हूँ की साहित्य के आगे कचरा जैसा शब्द लगकर उसका अपमान न करे आप चाहे मुझे बेकार, घटिया दर्जे का कहा सकते हैI मगर साहित्य से हिंदी लेखको के बीच पनप रहे भेदभाव की बू नहीं आनी चाहिए I देश में वैसे भी हिंदी पाठक बहुत कम है, जिन पाठको को पढने का शौक है वो भी अधिकतर अंग्रेजी से हिंदी में अनुवादित किताब पढ़ना पसंद करते है I में इन महान साहित्कारो से पूछना चाहती हूँ आज के मौजूदा समय में एक भी सफल हिंदी लेखक का नाम बता देI ये समय नहीं एक-दुसरे की आलोचना करने का ये समय है हिंदी साहित्य को उसके पाठको तक पहुचाने का I

रिंकी
https://rinkiraut13.blogspot.in/

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jain के द्वारा
January 16, 2018

बहुत ही संवेदनशील रचना है

Rinki Raut के द्वारा
January 16, 2018

धन्यवाद्

Shobha के द्वारा
January 16, 2018

प्रिय रंकि तुम तो सटीक लिखती हो मैं तकरीबन सबके लेख पढ़ती हूँ कुछ अति उत्तम लिखते हैं पता नहीं क्यों उन तक प्रतिक्रिया नहीं जाती मेरे शुरू के १२ लेखों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई थी बाद में कुछ ने समझा शायद में भी कुछ लिख लेती हूँ उनमें श्री सद्गुरु जी थे

Rinki Raut के द्वारा
January 17, 2018

आदरणीय शोभा जी, आपके योगता और लेखन कुशलता में कोई सन्देश नहीं कर सकता, हम युवा एक अजीब सी बीमारी के शिकार है , जिसे “मैं सिर्फ मैं” के नाम से जाना जाता है, इस में हम सिर्फ बोलते है या लिखते है, न किसी की सुनते है न कुछ पढ़ते हैI

sinsera के द्वारा
January 18, 2018

यहाँ पर आपका कहना सही है रिंकी जी कि आजकल युवा अपना लिखा हुआ पढ़वाना चाहते हैं लेकिन किसी का लिखा पढ़ना नहीं चाहते. रही बात “कचरा साहित्य” की तो आप सच्चाई से विचलित न हों. ये गली कूचे में कुकुरमुत्ते की तरह उगे हुए लेखक इंटरनेट पर और क्या परोस रहे हैं ? मुझे तो इस बात से भय होता है कि जिस भारतीय साहित्य पर आज हम गर्व करते हैं ,आज से 100 साल बाद उसमें से अच्छा साहित्य ढूँढना आसान न होगा. आदरणीय शोभा जी, आप अपने कमेंट्स में मुझे न भूलें,आपकी जनरल नॉलेज पर अचम्भा मिश्रित गर्व करने वालों में मेरा नंबर सबसे ऊपर है.

Piya के द्वारा
January 18, 2018

प्रिय रिंकी जी , इस साहसिक प्रयास के लिए आप बधाई की पात्र है …हाँ ठेस तो लगती है जब हमारी कृति को कचरा करार दिया जाता है …..और हाँ भाई भतीजा वाद तो हमारे समाज में बरगद की जडों सा पैठ गया है …… पर हमें निरंतर सृजन करना है ….

Rinki Raut के द्वारा
January 18, 2018

SINSERA, मैं आपके विचार से सहमत नहीं हूँ, हिंदी साहित्य की जड़े इतनी भी कमजोर नहीं की १०० वर्ष में खत्म हो जाएI देश में इन्टरनेट के अल्वा कोई माध्यम नहीं की लोग अपने विचरो को रख सके, बहुत धन्यवाद आपके कमेंट के लिए

Rinki Raut के द्वारा
January 18, 2018

Thanks Piya


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